करीब 1 साल पहले एक अधूरी सी कविता लिखी थी आज भी वो अधूरी ही है पर में पूरी नहीं करना चाहता ,वह अधूरी है ताकि आप उसे पूरी कर सके पेश ऐ खिदमत है अधूरी सी कविता , नाम है "जीवन राग"
धीमी हवाओ में घुँगरू बजते है।
डालियाँ नाचती है हवाओ की ताल में
तेज़ ठण्ड में
बस की खिड़की खोलके देखा है
नाक कैसे बर्फ़ जैसे जम जाती है ।
कभी कोहरे में जाकर नहाने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ
छत पर चाँद बारिस करता है
रौशनी की ,ठंडक की, शांति की ।
कभी सूरज को छिपते देखा है
वो भी लुकाछिपी खेलता है ।
तारे आकाश के समुद्र में झाग जैसे लगते है।
देखा है कभी आसमान को घूर के
कभी ओले को उठाओ और मुह में डालने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ
बूंदों की छुअन देखी है हाथो से,
सुना है बारिश का संगीत, हर बून्द कैसे टप टप करती है
और हर बून्द के साथ आ जाती है हरियाली , फूल,पत्ते ,समृद्धि [आँखों में चमक हर किसी के]।
कभी छत पे देखा है बारिश में लेट के ,
आँखे कैसे झट से बंद हो जाती है
कभी पम्पोला के नीचे आओ और तेज़ धार में नहाने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ।
गर्मी की सुबह,
सूरज कैसे पहाड़ो पर लाल रंग फैला देता है
और साथ ही बिखेर देता है अपनी आग धरती पे।
भरी दोपहरी ,
बेंत के सामने की नदिया में कभी लोर (तैरना) के देखा है,
कैसे तन बदन में ठंडक दौड़ जाती है
कभी गिल्ली डंडा उठाओ ,शाम के खुशनुमा मौसम में
बरगद के नीचे कुइयां से सुट्ट (चोट) मारने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ
पावश