करीब 1 साल पहले एक कविता लिखी थी नाम है जीवन राग .आपके सामने प्रस्तुत है
धीमी हवाओ में घुँगरू बजते है।
डालियाँ नाचती है हवाओ की ताल में
तेज़ ठण्ड में
बस की खिड़की खोलके देखा है
नाक कैसे बर्फ़ जैसे जम जाती है ।
कभी कोहरे में जाकर नहाने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ
छत पर चाँद बारिस करता है
रौशनी की ,ठंडक की, शांति की ।
कभी सूरज को छिपते देखा है
वो भी लुकाछिपी खेलता है ।
तारे आकाश के समुद्र में झाग जैसे लगते है।
देखा है कभी आसमान को घूर के
कभी ओले को उठाओ और मुह में डालने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठाओ
यह कविता अभी अधूरी है समय मिलगा तो अगली बार पूरी