सोमवार, 29 अगस्त 2016

जीवन राग

करीब 1 साल पहले एक कविता लिखी थी नाम है जीवन राग .आपके सामने प्रस्तुत है

धीमी हवाओ में घुँगरू बजते है।
डालियाँ नाचती है हवाओ की ताल में
तेज़ ठण्ड में
बस की खिड़की खोलके देखा है
नाक कैसे बर्फ़ जैसे जम जाती है ।
कभी कोहरे में जाकर नहाने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ

छत पर चाँद बारिस करता है
रौशनी की ,ठंडक की, शांति की ।
कभी सूरज को छिपते देखा है
वो भी लुकाछिपी खेलता है ।
तारे आकाश के समुद्र में झाग जैसे लगते है।
देखा है कभी आसमान को घूर के
कभी ओले को उठाओ और मुह में डालने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठाओ

यह कविता अभी अधूरी है समय मिलगा तो अगली बार पूरी

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

Ye jeevan hai

आदमी अपने चारो ओर अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार एक घेरा ,केंचुल बना लेता है । या यूँ कहे आम इंसान अपने आप को एक सीमा में बंद कर लेता है और उसमे जीना सीख जाता है वह उस सीमा से बहार निकलने की सोचता तक नहीं है । ये सीमा बीबी , बेटी ,बेटा ,मकान ,ऑफिस या अधिक हुआ तो मित्र और रिश्तेदारों तक सिमित रहती है वह इनके बारे सोचने के चक्कर में अपने खुद के बारे में सोचना भूल जाता है और चिंता तनाव पालने लगता है ।वह भूलने लगता है की वह एक स्वस्थ मनुष्य है । वह इन सीमाओ में जकड़न की चुभन के कारण जीना भूलने लगता है और धीरे धीरे बीमार होने लगता है । इस परेशानी से बचने के लिए इस बनाबटी केंचुल से बाहर आवे और उन्मुक्त हो जीवन जिए ।
परंतु लोकमर्यादा में रहकर सहजता से सहज होकर ।