रविवार, 15 अक्टूबर 2017

लिखना ऐसे होता है

नोट - मेरे जिगरी यारो कलेजो  आज ये नोट आप सबके लिए । आप समाज के सामने ,लोगो के सामने अपने विचारों को लाना चाहते है बदलाव लाना चाहते है इसका सबसे बेहतरीन माध्यम है लेखन । ये प्रक्रिया आपको एकदम से सबके सामने  नही लाती बल्कि इसका असर धीमे लेकिन गहरा होता है । इसलिए आप सब भी लेखन में जरूर हाथ आजमाए ।              

        खेर ये बात पढ़के आप में से कुछ लोगो को लिखने की बात दिमाक में आई होगी कि हम भी लिखना चाहते है पर अपन से अच्छा लिखते कहाँ बनता है लोगो के सामने कुछ भी लेख आएगा तो हँसी उड़ाएंगे । तो ये बात आप भूल जाइए आप बस लिखना शुरू कर दीजिए।     
    
   *लिखने के शुरुआत की कोई तैयारी नही करनी आप बस लिखना शुरू कर दीजिए औंधा सीधा जैसा भी हो।। 

  *आप परवाह मत कीजिये कि लोग क्या कहेंगे  । हर कोई पैदा होते ही नहीं बोलने लगता आप भी लिखते समय बेहतर प्रयास करे पर एकदम से परफेक्ट होने की कोशिश न करे । इसमें वक्त लगता है इसलिए शुरुआत कर दे बस कही से भी कभी भी।।       
   
* आप बस लिखे बिना किसी परवाह के बिना किसी भय के  ।।              

*लेखन का असर धीरे पर पुख्ता होता है इसलिए आप इसे अपना माध्यम बना लीजिए ।

जो आपके लिए आपके विचारों में किरान्ति ला देगा नया पन ला देगा ।      शुभकामनाओ सहित     ।।  

      पीयूष शास्त्री। 
        गौरझामर
        #बाबा

लिखना ऐसे होता है

नोट - मेरे जिगरी यारो कलेजो  आज ये नोट आप सबके लिए । आप समाज के सामने ,लोगो के सामने अपने विचारों को लाना चाहते है बदलाव लाना चाहते है इसका सबसे बेहतरीन माध्यम है लेखन । ये प्रक्रिया आपको एकदम से सबके सामने  नही लाती बल्कि इसका असर धीमे लेकिन गहरा होता है । इसलिए आप सब भी लेखन में जरूर हाथ आजमाए ।              

        खेर ये बात पढ़के आप में से कुछ लोगो को लिखने की बात दिमाक में आई होगी कि हम भी लिखना चाहते है पर अपन से अच्छा लिखते कहाँ बनता है लोगो के सामने कुछ भी लेख आएगा तो हँसी उड़ाएंगे । तो ये बात आप भूल जाइए आप बस लिखना शुरू कर दीजिए।     
    
   *लिखने के शुरुआत की कोई तैयारी नही करनी आप बस लिखना शुरू कर दीजिए औंधा सीधा जैसा भी हो।। 

  *आप परवाह मत कीजिये कि लोग क्या कहेंगे  । हर कोई पैदा होते ही नहीं बोलने लगता आप भी लिखते समय बेहतर प्रयास करे पर एकदम से परफेक्ट होने की कोशिश न करे । इसमें वक्त लगता है इसलिए शुरुआत कर दे बस कही से भी कभी भी।।       
   
* आप बस लिखे बिना किसी परवाह के बिना किसी भय के  ।।              

*लेखन का असर धीरे पर पुख्ता होता है इसलिए आप इसे अपना माध्यम बना लीजिए ।

जो आपके लिए आपके विचारों में किरान्ति ला देगा नया पन ला देगा ।      शुभकामनाओ सहित     ।।  

      पीयूष शास्त्री। 
        गौरझामर
        #बाबा

रिमांशु

खुली किताब के पन्ने यू ही उलटते रहते है
हवा चल न चले दिन पलटते रहते है
कित्ते सारे दिन बीत गए स्मारक को छोड़े हुए तुम सब लोगो को देखे हुए ,कमीनो बड़ी याद आती है तुम लोगो की तुम सब की जिनके साथ 5 साल के बडे कमाल के लम्हो को छुआ है और महसूस किया है। हर बंदे की कोई न कोई अपनी खासियत है हर बंदा अलहदा है बिल्कुल रत्नों की तरह जिनमे अपनी चमक हो अंदर से रोशनी आती हो। ये बेहद खास है मेरे लिए सिरीज़ इन्ही सब लम्हों को और बेहद खास यादों को आपके सामने लाने। का एक जरिया है मेरे लिए ।अभी वक्त हो चला है अपनी बात पे आने का सो इस लेख में  आपके सामने है रिमांशु लम्बा
रिमांशु लम्बाखोह - इधर पिटरोल से ड्राईक्लीन करवा के रखा कड़ाई वाला कुर्ता उन्होंने प्रेस के लिए भेज दिया उधर प्रेस से खबर आई कि इस बार लोटा उन्हें नही बब्बा को मिलेगा। खबर सुनते ही बड़ी बड़ी आंखों वाले क्यूट से बच्चे का दिल टूट गया । अब टूटे दिल का क्या है कि जुड़ तो जाता है पर अपने निशानों को छोड़कर । इस बार भी यही हुआ कि मेंढक की सी आंखों वाले लड़के ने आदर्शवादी खयालो को गालियां देते हुए कोसते हुए कहा छोटा सा वाक्य कहा 'भाड़ में जाये लोटा और भाड़ में जाये सब'
मामला सब शांत
ये बात तब की है जब रिम्मू कनिष्ट में पढ़ा करता था बड़ा छोटा सा था
अंगले साल जब वरिष्ट में सब स्मारक आये तो लगा रिम्मू अचानक से दो बिलांग बढ़ गया है
क्या करे उसके पास भी बढ़ने के अलावा कोई ऑप्शन ही न था ।
1st ईयर तक आते आते लड़के के विचार पूरी तरह बदल गए उसको असल जिंदगी जीने का जुनून सा आ गया जिंदगी जियो तो पूरे एटीट्यूड के साथ पूरी ठसक के साथ। गोमटेश्वर जी के साथ दोस्ती ।और मस्ती वाला माहौल जो वह अब भी बनाके रखता है उसे पहले से लुभाता तक
दरअसल एक बात की रिम्मू उसूलों का बड़ा पक्का है और दूसरी बात की वह दोस्तो के लिए कोई उसूल नही मानता। यही उसका सबसे बड़ा जीनियस है । हा वह थोड़ा बंद सा लगता है पर ये भी उसके उसूलों में से एक है कि अपनी कीमत खुद बनाओ दुसरो के हाथों खुद को बिकने मत दो ।लौंडा वक्त की नजाकत को अच्छे से समझता है इसलिए वह कहता है कि हमेसा सच बोलो और बोलते ही भाग जाओँ ।
आज तक जितने भी अविष्कारक हुए है वो अपने जीवन मे बड़े आलसी रहे है रिम्मू भी अपने छात्र जीवन मे आलसी रहे है आशा है (आशा भाभी नहीं कुत्तो आशा मतलब एक्सपेक्टेशन समझना) रिम्मू भी नई नई खोजे करेगा ।
लड़का बुद्धिजीवी है।  डिसेंट है स्मार्ट है पढ़ाई में भी अच्छा है
मुझे रूमपार्टनर के रूप में झेल चुका है मतलब सहनशील भी है
और मुझे गर्व है कि मैं उसकी कुछ निजी बातो का साझेदार भी हूँ

जैसे रिमांशु जयपुर की एक गिरलफ्रेंड बनाना चाहता है
रिम्मू चाहता है वह एक बड़ा सा विला बनाये जिसमे एक बड़ा रूम अपने यारो (मल्लब सारे मंगलमस् के लिए) के लिए हो
और भी कई सारी चीज़ें है जो यहाँ शेयर नही की जा सकती ।
रिम्मू दिखता नाज़ुक है पर है नही वो समझदार है और आखिरी बात की रिम्मू एक लड़का है
इति दर्दुर पुराणम्
पीयूष शास्त्री
गौरझामर
क्रमशः

जिंनेंद्र

इस लेख को लिखने से पहले आपको बता दू ये लेख 5 बार शुरू हो चुका है लेकिन हर बार अधूरा रह जाने के कारण डिलिट हो जाता था हर बार नया विषय ओर हर बार नए विचारों से लबरेज़ (पुष्ट) यह लेख है इसलिए इसे उतनी ही तबज्जो दे जितनी आपने मेरे पुराने लेखों को दी है                                  ।।                  ।     दरअसल बात यह है कि।             :          जिंदगी मेला दिखाने ले गई थी एक दिन ।और फिर भीड़ में उंगली छुड़ा का गुम हो गई। हमारे भविष्य और हमारी समस्याओ म् जिंदगी खो सी गई है पर हम अभी जिंदा है किन्ही प्यारी सी स्मृतियों को यादों में सजाएं । होता यू है कि एक प्याली कॉफ़ी ,बालकनी और बारिश हो तो यादे भरभराकर आँगन में खेलने लगती है और हमारे चेहरों पर असली मुस्कान उभर उठती है(हाय यही तो है जिंदगी)        तो इस बार अल्फाज़ो की उंगलियां पकड़कर यादे एक बेहद खूबसूरत इंसान पर अटक गई है और उस हसीन बंदे का नाम है जिंनेंद्र कुमार बमनोरा।                                          :.          जिनेन्द्र :  यार तुम्हारे लिये क्या लिखूं शब्द ही नही मिल रहे ऐसा लगता है जैसे अल्फाज़ो ने रूठकर खुदखुशी कर ली हो । खेर कही से शुरू करना ही पड़ेगा तो जिनेन्द्र के नाम से याद आता है एक लंबा और चुस्त लड़का जो हर बात पे बड़ी नज़ाकत और एक खास अंदाज़ से "जय हो" बोलता है और किसी बच्चे की तरह खिलखिला उठता है। उनके बचपन के एक सवाल का जबाब उन्हें अब तक नई मिला कि" जब 7वी क्लास में हिंदी की परीक्षा में अनुप्रास अलंकार के उदाहरण के रूप मे जानम जाने जा जानम जाने जा जाने जिगर जानेमन लिख के आये थे तो मास्टर साहब ने  नीम की पतली सी संटी से पूरे स्कूल में दौड़ा दौड़ा के क्यो मारा था " खेर ये भी कोई मुद्दे की बात नही है असली हृदय को बिदारने वाली घटना तो जब हुई जब ये एक शादी में गये और दुल्हन की बिदाई के ""बक्त दुल्हन रो। रही थी और दूल्हा विमल पानमसाला का पैकेट फाड़कर रजनीगंधा जर्दा मिला रहा था "" इस भयानक प्रसंग ने इनको समझा दिया की मौन से क्रांतियां नई होती अगर इस निर्मोही दुनिया में जीना है तो कोहराम मचा दो। और इसी सोच को लेकर ये स्मारक में दाखिल हो गए फिर तो इनकी जिंदगी की  पायल की झुनझुन खनखन और रुनझुन सब बजने लगी और फिर इनकी यात्रा ने एक नया मोड़ लिया । इस लड़के का मानना यह है कि "जीवन एक प्रतिध्वनि है आप जिस लहजे में आवाज़ देंगे आपको पलट कर वही सुनाई देगी " एक सीधा सरल लड़का एक छोटे से गाँव से आया और एक मेट्रो शहर में पड़ने लगा पड़ते हुए उसे अहसास हुआ कि वह भी खास है और साबित भी कर दिया कि वह भी काबिल बन सकता है फ़िलहाल भाई को सेर शेर बड़े पसंद है तो उसी को समर्पित "हमे तुमकोे तलाशने अतीत में जाना होगा जिसकी राहे बड़ी दिलफरेब है वहाँ बड़े कमीने काले कुत्ते है  साहब देखना कही काट न ले । खतरों से खेलने का तो शौक बचपन से है ही  की स्मारक के वार्डन बन बैठे फिलहाल भाई की तनख्वाह के बारे में न पूंछे बस इतना जान लीजिए कि  की जिंनेंद्र की तनख्वाह इतनी है कि आपका क्रियाकर्म बढ़िया तरीके से हो सकता है       ।।            ।।       इस लेख को लिखने के बाद

रिसAभ चर्चित

ये बेहद खास है
इस बार मे आपके सामने कुछ नया लाना चाहता था ये सब आपके लिए है जिसे में अपनी नज़र से पेश करूँगा
ये बेहद खास है सारे मंगलमो(mangalams) के लिए
ओये सब आ गए नेताजी गए यार अपना रिमांशु
अरे विजय तुम कंघी बाद में कर लेना
काके विको टर्मरिक फिर घिस लेना
गोलू भाभी से बात बाद में कर लिय्यो अबे इते आ जाओ
विशाल हाथ बड़े चमक रहे है ओहो बर्तन वाला काम
अनुभव इते सोइ खिलाओ चिप्स
वैभव को देखो आज भी सो रहा है
आओ रेगिस्तान के जहाज अपना सिर बचा के
चलो सब बैठ गए तो शुरू करते है में आप आपको दे रहा हूँ गुप्त सूत्रों से पता चली maglams से जुड़ी आदतें बाते अनुभव यादे और लम्हे
तो शुरुआत किससे चलो risabh से करते है

रिषभ- -कहने को ये दिल्ली से बिलांग करते है पर पांचवी साल तक आते आते दिल्ली बाली कोई बात नई रही। हाँ तो बचपन में दिल्ली के पास एक गांव में एक लल्ला पैदा हुआ तो बाहर से एक बाई बोली एक ब्रम्हचारी पैदा हुआ है ये लल्ला था ऋषभ । पैदा होने के पंद्रहवे साल तक इस राजकुमार का जीवन बड़े साधारण तरीके से बीता । स्मारक आने के बाद ये सीधे  कक्षा की वटु श्रेणी के प्रथम विद्यार्थी बने हालाँकि यहाँ भी लगभग 3 से 4 महीने इन्होंने बैराग्य के कोई लक्षण नई प्रगट किये बाद में जो हुआ उसके बाद ये पंडित विद्वान और न जाने किन किन महान सम्बोधनो से पुकारे जाने लगे । हालांकि भैया जी रागरंग से दूर रहने बाले है  फिर भी नृत्य करना बड़ा पसंद है और तो इस बालक के बारे में क्या कहे बालक होनहार है बुद्दिमान है हालांकि मुझे नही पता है कि बुद्दिजीबी होने के लिए कितने जीबी बुध्दि की जरूरत पड़ती है पर जितनी भी जरूरत होती है भैया जी के पास उससे  40 50 ग्राम ज्यादा ही होगी।

अब नंबर आता है इनके ही परम मित्र कहे जाने वाले चर्चित कुमार
#चर्चित = बचपन मे हमे पढ़ाया जाता था रेगिस्तान का जहाज़ को कहलाता है तब मेरे दिमाक में एक सबाल भोत जोर से आता था रेत में जहाज़ कोन चलाने की सोचेगा )अचानक बड़ी  जोर से आवाज़ आती थी ^ऊंट ^ स्मारक में करीब ढाई महीने रहने के  बाद एक बच्चा स्मारक में आया ।सुना था दादा के एक प्रबचन ने उसका जीवन बदल दिया। पर उसे सामने देखकर दिल औऱ दिमाक में एक ही आवाज़ बड़ी जोर से आई ओ रे ऊंट। स्मारक में आने के बाद पूरी सालभर इस रेगिस्तान के जहाज का आतंक पूरी क्लास पर छाया रहा दरअसल भैया जी बड़े बुद्धिजीवि में गिने जाते है लेकिन जब किसी लड़के से मज़ाक करते थे तो बंदा हैरान रह जाता था ये क्या हुआ
एक साल बाद अचानक एक चमत्कार हुआ और 12वी में 2 महीने बाद क्लास में मस्तियो में गिरावट देखी गई  सूत्रों के हवाले से खबर मिली कि चर्चित की किसी से दोस्ती हो गई है
हुआ यूं कि त्रिमूर्ति (अब पंचमूर्ति)जिनालय के आंगन में बैठे एक बच्चे को चर्चित ने देखा ये ऋषभ था दोनो में कुछ बाते फाते हुई बिचारो की अदला बदली हुई । ये साथ भैया जी को इत्ता पसंद आया कि बटु श्रेणी में एक नाम और जुड़ गया और इस मुलाकात ने 5 साल के इतिहास में दोस्ती की मिसाल दे जाने बाली जोड़ी में इन्हें तब्दील कर दिया (हालांकि इस क्लास में        ऐसी कई जोड़िया बनी है) ।
स्मारक के पांच साल के लंबे जीवन मे चर्चित ने अपनी प्रतिभा के लाजबाब नमूने दिखाए
। कभी समाज सुधारक कभी प्रेरक तो कभी बोर्डन बनकर
पर अंततः इनका समाजसुधार से मोहभंग} हो गया और ये अपने काम मे जुट गए ।
              पीयूष शास्त्री  
शेष मांग आने पर क्रमशः

गोलू

2 लेखों के लिए पर्सनली हौसलाआफजाई के लिए भोत भोत धन्यवाद सच में मुझे नहीं मालूम था कि आपकी प्रतिक्रियाएं इतनी ज्यादा जिन्दा और सहज होंगी ।

इस बार मैं आपको एक ऐसे लड़के के बारे में बताने वाला हूँ जो मेरा भाई है मेरे ताऊ जी के पुत्र श्री गोलू जी महाराज उर्फ़ शुभम कुमार जैन उफ़ गलत हो गया शुभम जैन उर्फ़ गोलू
गोलू(शुभम)= 27 अप्रेल 1995 को गौरझामर के नयापुरा मोहल्ला में महका वालो के मंझले बेटे की बहू(मेरी ताई जी) के यहाँ लल्ला होने वाला था सब लोगो के चेहरे अजीब से कन्फूजन से भरे थे दरअसल 2 लड़कियों के बाद भारत में चाहे गांव हो या शहर माता पिता सास ससुर घरवाले सब एक ठो लल्ली नई लल्ला चाहते हैं इस बार जब ताई उम्मीद से हुई तो सब को उम्मीद हो गयी की इस बार तो वंश बढाने वाला आयेगा लल्ला आयेगा  । गाँव की सारी बाईया(मल्लब दादी और दाइ लोग भीडू) और विशेषज्ञ लोग महका वालो के यहाँ शौर वाले कमरे में अपने काम पे लगे थे .। प्रसव शुरू हो गया था कुछ ही देर में बच्चे की बाई (बुंदेलखंड में माँ और दादी को बाई कहते है यहाँ बाई मल्लब दादी) शौर वाले कमरे से कपडे में लिपटे एक नन्हे से जीव को अपने हाँथो में लेकर बाहर आई और उसे अपने  मंझले लड़के के हाथों में देते हुए कहा "मोड़ा भओ है अज्जू" (बधाई हो लड़का हुआ है) और शौर में भाग गई । ताऊ की आँखों से दो बुँदे गिर गई उन्होंने बच्चे के मांथे पर चुम्बन अंकित करते हुए कहा मेरा गोलू बच्चे के गाल और मुँह प्यारे रूप से गोलमटोल थे। करीब डेढ़ साल बाद उसका भाई भी इस दुनिया में आया पर वो कहानी अलग है ।
तो बस यही से शुरु हो जाती है गोलू की कहानी । गोलू को छह महीने बाद एक नया नाम मिला शुभम जो बुआ ने रखा पर वो नाम हमेशा स्कूल के रजिस्टर में लिखवाने के काम में ही आया स्कूल और मोहल्ले के बच्चो में भाई गोलू के नाम से ही मशहूर रहे
दरअसल दूसरी बात ये भी है कि गोलू मेरे से एक दरजे आगे था पर तीसरी 3rd में शनि और मेरे साथ की बजह से एक दर्ज़ा पीछे आके पढने लगा । हमारी किलास में 7 ठो शुभम थे लोधी रावत भारिल्ल मिश्रा शर्मा विश्वकर्मा चलो आज भी हमारे यहाँ पहला नाम बनिया हिन्दू ईसाई नै होता बरना बहुत ज्यादा बटवारा हो जाता
हाँ तो 7 शुभम के होने के चक्कर में टीचर तो पप्पा का नाम साथ में लगाके काम चला लेते थे लेकिन लड़के तो नए नए नाम इज़ाद करके पुकारने लगे पर गोलू का नामकरण करने की जहमत लड़को ने नई उठाई क्युकी उसका नाम तो पहले ही बिगड़ा हुआ था गोलू मोलू कैसा गोल सा नाम है लड़के एक पेपर लेते और एक गोल बनाते और उसके नीचे उ की मात्रा लगाते और गोलू के पास फेंक देते  ।पर कुछ दिन तक कोई रिस्पॉन्स न मिलने पर लड़को ने ऐसा करना बंद कर दिया  ।
गोलू की दसवीं तक पढ़ाई गौरझामर में हुई 10 वि में भैया जी ने ब्लॉक टॉप तो नई  पर ब्लॉक के 1टॉप 10 में जगा(जगह)बना ली
इसके बाद गौरझामर का यह गबरू जवान लड़का जयपुर पंहुचा और अपनी ऊँची hight के कारन मंगलम में ऊंटो वाली जगह अपने नाम कर ली हालांकि ऑफिसियल रेगिस्तान के  जहाज (चर्चित)के आने के बाद ये जगह दूसरे न.पर आ गई  ।
बेसे एक पर्सनल बात बता दू 10 वीं तक भैया पर लड़कियों का मर मिटना चालू हो गया था भगवन की दया से लुक्स और फिटनेस का जाने कोनसा राज था जो लडकिया इनके लिए पटरियां तक उखाड़ने को तैयार रहती थी हालाँकि  वो सिलसिला आज भी जारी है । पर दसवीं की परीक्षा में लग जाने के कारण भैया ने अपना कॉन्सन्ट्रेट पढाई पर बनाये रखा ।
जयपुर आने के बाद भैया के कांट्रेक्ट स्टेट से बदलकर राष्ट्रीय हो गए पाटिल नमन भिंड गोरमी अरिहन्त जैसे नए पर लाजवाव दोस्तों के साथ दोस्ती का आगाज किया और उसे 5 वि साल तक निभाते रहे
कहा जाता है कि स्मारक से जो भी बंदा किसी एक जगह 3 बार हो आये तो बही अपने समवसरण की व्यवस्था हो जाती है पर गोलू इस मामले में अपवाद था भाई 3 साल में 3 जगह गया और 3 समवसरण की व्यवस्था की जुगाड़ बना आया । उसके बावजूद गोलू ने ईमानदारी बरतते हुए 1 जगह चुन ली डबरा mp (भाई ने चुनाव में स्टेट को बनाये रखा ) नाम में  नहीं बताऊंगा (मुझे पता है इस बात पे गोलू के चेहरे पर मुस्कान आ गई होगी)
भाई की कुछ  विशेषताओं पर पिरकाश दाल दू4
गोलू स्मार्ट लड़का है
गोलू बड़ा दोस्ताना और सभ्य लड़का है
गोलू को बुंदेलखंडी बड़ी पसंद है काय लडुआ से फोर रये हो ।को आओ । जैसे वाक्य गोलू के मुख से गिरते रहते  है (100डंडी 1 बुंदेलखंडी)
और लास्ट गोलू लड़का है इस किरन्तिकारी पोस्ट के बाद मेरे गोलू द्वारा पिटने का प्रतिशत 100.100%
#पीयूष शास्त्री

सर्वदर्शी

और सिलसिले जब शुरू हो जाते है तो बस शुरू ही हो जाते है पता ही नहीं चलते रस्ते में कितने पड़ाव आते है और कितने कांटे ।मगर सिलसिलों को यह जो सिलसिला है वो यूँ ही जारी रहे (क्योंकि मेरे से ज्यादा कोई और भी है जो इन सिलसिलों का इन्तजार कर रहा है)   बैसे आज में जिस शख्स से रूबरू करवाने वाला हूँ उसे आप जानते भी याद भी ज्यादा करते है पर फिर भी कुछ नहीं जानते   ।।  अक्सर यूही होता है हम साथ में होते हुए भी अनछुए रह जाते है ।।  तो साहेबान कदरदान तैयार हो जाइये इन मोहतरमा से मिलने नाम तो समझ् ही गए होंगे।                                         सिद्धि भारिल्ल =उर्फ़ सर्वदर्शी उप्स उल्टा हो गया सर्वदर्शी भारिल्ल उर्फ़ सिद्धि उप्स डॉलर (इनके हस्ताक्षर का सुरुआति अक्षर डॉलर का चिन्ह हुआ करता है)भारिल्ल ।      ओके तो अब शुरुआत शुरू से करते है ।         तो दंतकथाओं में इनकी उत्पत्ति(अवतरण या अवतार' शब्द अपनी श्रद्धा के अनुसार चुन सकते है फतवा जारी होने तक) गुलाबी प्रदेश की सबसे पाश कॉलोनी में हँसते हुए मानी जाती है जी हाँ  बच्चे प्रायः रोते हुए भोकाल मचाते हुए पैदा होते है पर ये खातून मुस्कुराते हुए पैदा ओह सारी अवतरित हुई थी।                            वर्तमान निवास नारायण टॉवर के सबसे ऊंचे टीले पर जहाँ हँसते हुए इतराते हुए उबकाई लेते हुए (भारत की आम लड़कियों की तरह)मेरे पापा मेरे हीरो है और मैं पप्पा की परी हूं(हॉ बाकि हम् तो अपनी अम्मी के ठठरी के बंधे है) जैसे मन्त्र जपे जाते है।                                     गोत्र का कोन पूछे रिजर्वेशन न मिलेगा और न वो दिन बचे जब (इन्हें हम बहन न बोलते थे  )  इनके लिए लिए पटरियां उखाड़ते फिरे ।  (साले इस रक्षाबंधन की तो ऐसी की तैसी)           बेसे आम ब्यक्ति और इन जैसे अलफ़ोसो व्यक्ति में इतना अंतर तो होता ही है कि जहाँ हम् लोगो का बड्डे एक दिन में में पूरा हो जाता है इनके लिए ये पूरे हफ्ते भर चलने बाला अनुष्ठान होता है जिसकी पूर्णाहुति आज होती है।     केक पसंद है और चाको लावा ब्लैक फारेस्ट और डार्क फैंटसी खिलाने वाले को 1 महीने तक सभी गालियों और दुत्कार से छूट मिलती है चाहे जो उत्पात मचा लो।।         बैसे बुद्धिमान भी बहुत है अक्सर मेरे से एक बात बोलती रहती थी भाई ये अक्कड़ बक्कड़ बॉम्बे बो 80+90 पुरे 100 ये 100 कहा हुए 80+90ये तो 170 हुए   ।।  और भी इन्होंने बचपन में समझदारी के बहुत झंडे गाड़े बस मिल नहीं रहे ।।    छोरी होनहार है बहुत आगे तक जायेगी  ।                           दरअसल इसे लगता है बारिस में भीगना  जीवन की सुन्दर बातो में से एक है ।                            आर्ट और क्राफ्ट पेंटिंग की शौक़ीन है (इस बात की सत्यता जाँच ल ले , लेखक इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं है बाकी जो भी विवाद होगा वो झरिया और करइआ की पंचायत में निपटाया जायेगा)                                    एक राज की बात बता दे की जैसे जैसे पेपर नज़दीक आते जाते है इनके अंदर का कलाकार जागने लगता है (पेपर के दिनों में इनसे बात करने का खतरा अपनी रिस्क पर ले)                              अब असल बात बता दे तो 3 साल तो इस जीव को अपनी क्लास में देखना बिलकुल अलग सा था ,है कोई  होगा  । पर 2nd ईयर में 12 12 बजे रात तक कंधे से कंधे मिलाकर विदाई में काम किया उसके बाद तो लगा ये लड़की भी आइडियाज का पिटारा है इमोसन्स और फीलिंग्स का भंडार है फिर शायद अपना लिया अपनी क्लास में बिलकुल अपनी तरह । कक्षा की एक मात्र लड़की होने पर भी इसे कोई आंच नहीं आई (ये प्राचार्य महोदय और sp चाचा का डर भी हो सकता है) ये मेरी ही क्लास का कमाल था । एक फ़रिश्ते की तरह मिली बहन जैसे झगड़ी और दोस्तों जैसे खिलखिला उठी यही तो थी अपनी सिद्धि बाई उप्स सर्वदर्शी बाई    ।।  तो बोलो मितरो जिज्जी की .....😋😋