और सिलसिले जब शुरू हो जाते है तो बस शुरू ही हो जाते है पता ही नहीं चलते रस्ते में कितने पड़ाव आते है और कितने कांटे ।मगर सिलसिलों को यह जो सिलसिला है वो यूँ ही जारी रहे (क्योंकि मेरे से ज्यादा कोई और भी है जो इन सिलसिलों का इन्तजार कर रहा है) बैसे आज में जिस शख्स से रूबरू करवाने वाला हूँ उसे आप जानते भी याद भी ज्यादा करते है पर फिर भी कुछ नहीं जानते ।। अक्सर यूही होता है हम साथ में होते हुए भी अनछुए रह जाते है ।। तो साहेबान कदरदान तैयार हो जाइये इन मोहतरमा से मिलने नाम तो समझ् ही गए होंगे। सिद्धि भारिल्ल =उर्फ़ सर्वदर्शी उप्स उल्टा हो गया सर्वदर्शी भारिल्ल उर्फ़ सिद्धि उप्स डॉलर (इनके हस्ताक्षर का सुरुआति अक्षर डॉलर का चिन्ह हुआ करता है)भारिल्ल । ओके तो अब शुरुआत शुरू से करते है । तो दंतकथाओं में इनकी उत्पत्ति(अवतरण या अवतार' शब्द अपनी श्रद्धा के अनुसार चुन सकते है फतवा जारी होने तक) गुलाबी प्रदेश की सबसे पाश कॉलोनी में हँसते हुए मानी जाती है जी हाँ बच्चे प्रायः रोते हुए भोकाल मचाते हुए पैदा होते है पर ये खातून मुस्कुराते हुए पैदा ओह सारी अवतरित हुई थी। वर्तमान निवास नारायण टॉवर के सबसे ऊंचे टीले पर जहाँ हँसते हुए इतराते हुए उबकाई लेते हुए (भारत की आम लड़कियों की तरह)मेरे पापा मेरे हीरो है और मैं पप्पा की परी हूं(हॉ बाकि हम् तो अपनी अम्मी के ठठरी के बंधे है) जैसे मन्त्र जपे जाते है। गोत्र का कोन पूछे रिजर्वेशन न मिलेगा और न वो दिन बचे जब (इन्हें हम बहन न बोलते थे ) इनके लिए लिए पटरियां उखाड़ते फिरे । (साले इस रक्षाबंधन की तो ऐसी की तैसी) बेसे आम ब्यक्ति और इन जैसे अलफ़ोसो व्यक्ति में इतना अंतर तो होता ही है कि जहाँ हम् लोगो का बड्डे एक दिन में में पूरा हो जाता है इनके लिए ये पूरे हफ्ते भर चलने बाला अनुष्ठान होता है जिसकी पूर्णाहुति आज होती है। केक पसंद है और चाको लावा ब्लैक फारेस्ट और डार्क फैंटसी खिलाने वाले को 1 महीने तक सभी गालियों और दुत्कार से छूट मिलती है चाहे जो उत्पात मचा लो।। बैसे बुद्धिमान भी बहुत है अक्सर मेरे से एक बात बोलती रहती थी भाई ये अक्कड़ बक्कड़ बॉम्बे बो 80+90 पुरे 100 ये 100 कहा हुए 80+90ये तो 170 हुए ।। और भी इन्होंने बचपन में समझदारी के बहुत झंडे गाड़े बस मिल नहीं रहे ।। छोरी होनहार है बहुत आगे तक जायेगी । दरअसल इसे लगता है बारिस में भीगना जीवन की सुन्दर बातो में से एक है । आर्ट और क्राफ्ट पेंटिंग की शौक़ीन है (इस बात की सत्यता जाँच ल ले , लेखक इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं है बाकी जो भी विवाद होगा वो झरिया और करइआ की पंचायत में निपटाया जायेगा) एक राज की बात बता दे की जैसे जैसे पेपर नज़दीक आते जाते है इनके अंदर का कलाकार जागने लगता है (पेपर के दिनों में इनसे बात करने का खतरा अपनी रिस्क पर ले) अब असल बात बता दे तो 3 साल तो इस जीव को अपनी क्लास में देखना बिलकुल अलग सा था ,है कोई होगा । पर 2nd ईयर में 12 12 बजे रात तक कंधे से कंधे मिलाकर विदाई में काम किया उसके बाद तो लगा ये लड़की भी आइडियाज का पिटारा है इमोसन्स और फीलिंग्स का भंडार है फिर शायद अपना लिया अपनी क्लास में बिलकुल अपनी तरह । कक्षा की एक मात्र लड़की होने पर भी इसे कोई आंच नहीं आई (ये प्राचार्य महोदय और sp चाचा का डर भी हो सकता है) ये मेरी ही क्लास का कमाल था । एक फ़रिश्ते की तरह मिली बहन जैसे झगड़ी और दोस्तों जैसे खिलखिला उठी यही तो थी अपनी सिद्धि बाई उप्स सर्वदर्शी बाई ।। तो बोलो मितरो जिज्जी की .....😋😋
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