हर चीज नयी है
उसे नजर भर के देखिये
हर बात नयी है
अनुभव करके देखिये
जिंदगी के फलसफों में
जाहिर नहीं होती जिंदगी
हर कतरा जिंदगी का
आप जीकर देखिये
हम उठे और गिरे
और गिरके थम गये
इस मुसीबत एकबारी
मुस्कुरा कर देखिये
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016
नयी बात
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016
6.10.2016
कल सुबह बेहद खूबसूरत थी जब मैं सो के उठा तो जामुन का दरख मेरी खिड़की से मुस्कुरा रहा था उस पर बैठे परिंदे ख़ुशी से चिल्ल पो मचा रहे थे
तभी एक ख्याल आया आज शिखर जी जाना है
हाँ शिखर जी ,इसे में जैनियो का मदीना कहता हूं
जाहिर सी बात है मैं उत्साहित था। नाटक जिसकी तैयारी हम पिछले 3-4 दिनों से कर रहे थे उसकी ड्रेस लाने गए उन्हें लाते लगभग 2 बज गए थे
बस हमारा इंतजार कर रही थी हमने अपना सामान उठाया और बस से रेलवे स्टेशन पहुचे 3 बजे ट्रैन तशरीफ़ ले आयी थी हमने उसमे सामान जो बक्सो में था ट्रैन में रखवाया ।और में कोच 3 की ओर भागा जिसकी 5 no सीट पर मेंरा आरक्षण था अर्पित दीपक विजय सिद्धार्थ मेरा इंतजार कर रहे थे
पुराने गाने और दोस्तों की प्रेमिकाओं के नाम याद करते करते कब सुबह के 12 बज गए फिर 2 और कब पारसनाथ आ गया पता ही नहीं चला
पारसनाथ पर 2 घंटे का इंतजार और फिर मधुवन
इस बीच ट्रैन से दिखता झारखण्ड इलाहबाद का प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक सौन्दर्य मेरे मन को गर्वित करता रहा सच में हमारे भारत का हर क्षेत्र अपने आप में अलग अनुभूतियों से लदा हुआ है जिसे महसूस कर आप गर्वित हो सकते है
मुझे गर्व है अपने भारत पर उसकी सांस्कृतिक धरोहरों पर अपने धर्म पर
आज मधुवन में ही तेरापंथी कोठी के मंदिर के दर्शन किये बाकई भव्य मंदिर जिन्हें देखकर आपमें सुष्कता की बजाय स्निग्धता पैदा हो जाती है
आज के दिन तुम सच में कमाल के थे
Peeyush
गुरुवार, 1 सितंबर 2016
जीवन राग
करीब 1 साल पहले एक अधूरी सी कविता लिखी थी आज भी वो अधूरी ही है पर में पूरी नहीं करना चाहता ,वह अधूरी है ताकि आप उसे पूरी कर सके पेश ऐ खिदमत है अधूरी सी कविता , नाम है "जीवन राग"
धीमी हवाओ में घुँगरू बजते है।
डालियाँ नाचती है हवाओ की ताल में
तेज़ ठण्ड में
बस की खिड़की खोलके देखा है
नाक कैसे बर्फ़ जैसे जम जाती है ।
कभी कोहरे में जाकर नहाने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ
छत पर चाँद बारिस करता है
रौशनी की ,ठंडक की, शांति की ।
कभी सूरज को छिपते देखा है
वो भी लुकाछिपी खेलता है ।
तारे आकाश के समुद्र में झाग जैसे लगते है।
देखा है कभी आसमान को घूर के
कभी ओले को उठाओ और मुह में डालने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ
बूंदों की छुअन देखी है हाथो से,
सुना है बारिश का संगीत, हर बून्द कैसे टप टप करती है
और हर बून्द के साथ आ जाती है हरियाली , फूल,पत्ते ,समृद्धि [आँखों में चमक हर किसी के]।
कभी छत पे देखा है बारिश में लेट के ,
आँखे कैसे झट से बंद हो जाती है
कभी पम्पोला के नीचे आओ और तेज़ धार में नहाने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ।
गर्मी की सुबह,
सूरज कैसे पहाड़ो पर लाल रंग फैला देता है
और साथ ही बिखेर देता है अपनी आग धरती पे।
भरी दोपहरी ,
बेंत के सामने की नदिया में कभी लोर (तैरना) के देखा है,
कैसे तन बदन में ठंडक दौड़ जाती है
कभी गिल्ली डंडा उठाओ ,शाम के खुशनुमा मौसम में
बरगद के नीचे कुइयां से सुट्ट (चोट) मारने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ
पावश
सोमवार, 29 अगस्त 2016
जीवन राग
करीब 1 साल पहले एक कविता लिखी थी नाम है जीवन राग .आपके सामने प्रस्तुत है
धीमी हवाओ में घुँगरू बजते है।
डालियाँ नाचती है हवाओ की ताल में
तेज़ ठण्ड में
बस की खिड़की खोलके देखा है
नाक कैसे बर्फ़ जैसे जम जाती है ।
कभी कोहरे में जाकर नहाने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी के लुत्फ़ उठाओ
छत पर चाँद बारिस करता है
रौशनी की ,ठंडक की, शांति की ।
कभी सूरज को छिपते देखा है
वो भी लुकाछिपी खेलता है ।
तारे आकाश के समुद्र में झाग जैसे लगते है।
देखा है कभी आसमान को घूर के
कभी ओले को उठाओ और मुह में डालने का जोखिम भी उठाओ
अरे मेरे दोस्त ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठाओ
यह कविता अभी अधूरी है समय मिलगा तो अगली बार पूरी
शुक्रवार, 19 अगस्त 2016
Ye jeevan hai
आदमी अपने चारो ओर अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार एक घेरा ,केंचुल बना लेता है । या यूँ कहे आम इंसान अपने आप को एक सीमा में बंद कर लेता है और उसमे जीना सीख जाता है वह उस सीमा से बहार निकलने की सोचता तक नहीं है । ये सीमा बीबी , बेटी ,बेटा ,मकान ,ऑफिस या अधिक हुआ तो मित्र और रिश्तेदारों तक सिमित रहती है वह इनके बारे सोचने के चक्कर में अपने खुद के बारे में सोचना भूल जाता है और चिंता तनाव पालने लगता है ।वह भूलने लगता है की वह एक स्वस्थ मनुष्य है । वह इन सीमाओ में जकड़न की चुभन के कारण जीना भूलने लगता है और धीरे धीरे बीमार होने लगता है । इस परेशानी से बचने के लिए इस बनाबटी केंचुल से बाहर आवे और उन्मुक्त हो जीवन जिए ।
परंतु लोकमर्यादा में रहकर सहजता से सहज होकर ।