आदमी अपने चारो ओर अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार एक घेरा ,केंचुल बना लेता है । या यूँ कहे आम इंसान अपने आप को एक सीमा में बंद कर लेता है और उसमे जीना सीख जाता है वह उस सीमा से बहार निकलने की सोचता तक नहीं है । ये सीमा बीबी , बेटी ,बेटा ,मकान ,ऑफिस या अधिक हुआ तो मित्र और रिश्तेदारों तक सिमित रहती है वह इनके बारे सोचने के चक्कर में अपने खुद के बारे में सोचना भूल जाता है और चिंता तनाव पालने लगता है ।वह भूलने लगता है की वह एक स्वस्थ मनुष्य है । वह इन सीमाओ में जकड़न की चुभन के कारण जीना भूलने लगता है और धीरे धीरे बीमार होने लगता है । इस परेशानी से बचने के लिए इस बनाबटी केंचुल से बाहर आवे और उन्मुक्त हो जीवन जिए ।
परंतु लोकमर्यादा में रहकर सहजता से सहज होकर ।
शुक्रवार, 19 अगस्त 2016
Ye jeevan hai
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