शनिवार, 17 जून 2017

ये बेहद खास है

चलो यार सपने देखते है अपनी जिद के ,चलते है फिर उसी गली में जहाँ इमारते सपनो की मिट्टी से बनती है जहाँ हकीकत की गर्मी से बेपरवाह वक्त की उम्मीदों की ठंडी ठंडी हवाएं चलती है बेहतर कल के साये तले कुछ ज़िद्दी लोगो की नींदे सोती है।                         मैं  जानता हूँ कि ये आसान नही पर तुम्हे आसान काम पसंद कहा है चलो एक बार फिर पागलपन करे जो सच मे पागलपन है चलो फिर एक सपना देखे ।।                ऐसे में अगर कोई समझदार सच की कहानियां सुनाकर डराए तो बेहिचक आ जाना मेरे पास, में तेरे कंधे पे वही नर्म हाथ रखूंगा और कहूंगा *टेंसन न ले देख लेंगे यार*    ।।                           तो इस बार *ये बेहद खास है मेरे लिए*सिरीज़ में ऐसे ही एक पक्के वाले दोस्त यार जिसे आप हमेशा सहेजना पसंद करेंगे का परिचय देने जा रहा हूँ लड़के का नाम है ज्ञायक और ये लौंडा है अमरमउ से ।।                            *ज्ञायक*- ये नाम सुनते ही जहन में एक जहीन सा दुबला पतला सा लड़का याद आता है जो हर मुश्किल को कभी सीरियस नही लेता हाँ ये जरूर है कि ये डॉक्टरी अच्छी कर लेता है मैं ज्ञायक से स्मारक में मिला एक आत्मविश्वास से भरा लड़का जो अपनी आंखों में कुछ जिन्दा सपने लेकर चलता था (दरअसल मुझे यहाँ है लिखना ज्यादा अच्छा लगता ) पर साथ ही अपने साथ एक बेपरवाही को लिए हुए ।।                                  सामने बात करता तो लगता था किसी खुरदुरी चीज़ को आप टटोलने की नाकाम कोशिश कर रहे है।।                                    एक सपने की भूख तब तक पूरी नही होती जब तक वह अपनी मंजिल को प्राप्त न हो जाये  ।।   इसकी आंखों में वही भूख और खुशी की झलक देख लेना कभी आप महसूस करेंगे एक गीला समंदर और उसकी साफ लहरों को ।।                 चलिए इत्ती सारी बाते पचाना सरल नई होगा पर जयपुर आके ज्ञायक को बड़ी कस के  किरान्ति  करनी थी वह चला ही जा रहा था इस उम्मीद के साथ कि अब किरान्ति की आखिरी सीढ़ी पर ही जाके रुकूँगा और जब   तक मंज़िल मिल नही जाती चलता ही रहूंगा।   ज्ञायक आगे बढे ही जा रहा था बढ़े ही जा रहा था फिर अचानक रास्ते मे चाय की थड़ी आ गई 😋   फिर क्या ज्ञायक चाय पीने रुक गया।।।।।                              बचपन मे ज्ञायक दुबला नही था उसने बड़ी मेहनत से खा पीकर अपना शरीर बनाया था लेकिन कीड़े पड़े इस mp की गर्मी में जो उसकी सारी मेहनत पसीने   में वह गई।        ।।                 बहरहाल ज्ञायक का जिंदगी के बारे में एक शानदार खयाल है कि *जिंदगी क्या है भटुरो के साथ मिलने वाले    छोलों में कोने में पड़ा काला चना* चलिए तो एक दोस्त है इनका *शुभम मड़ावरा*       उधर वासेपुर जल रहा था मगर इधर अपनी पाल्टी में दोस्ती का एक नया अध्याय लिखा जा रहा था...बात पुरानी है! रामाधीर सिंह(शुभम मड़ावरा) और शेरखान(ज्ञायक अमरमऊ ) की दोस्ती तब हुई जब दोनों के हाई स्कूल के एग्जाम शुरू होने वाले थे और दोनों का सेंटर एक ही था। इतिहास गवाह है बाबा( ज्ञायक)को केमिस्ट्री तब नहीं आती थी और रामाधीर (शुभम मड़ावरा)को हिंदी और इंग्लिश आज भी नहीं आई। दोनों लोग साथ इमली और चूरन खाते हुए एग्जाम से चंद मिनट पहले, बहुत सीरियस होकर पढ़ाई करते थे। ख़ैर रिजल्ट के बाद दोनों की दोस्ती और गहरी हो गयी आज भी दोनों अक्सर ही जय जिंनेंद्र वाले के यहाँ कोटा कचोरी खाते हैं.भगवान करे इनकी दोस्ती को किसी लड़की की नज़र न लगे । बेसे ज्ञायक के बारे में एक बात और कहूंगा इसका दिल बड़ा साफ है सो लड़कियां बेहिचक try मारे ।।

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