सरकारी स्कूल में पढ़ाना केवल पढाना नई होता ये तो उन हालातो को पढ़ना होता है जिनमे स्कूल के बच्चे बसर करते है । दरअसल आपको यहाँ प्राइवेट स्कूलों के बच्चो जैसे पैक्ड मुस्कान और खिल चेहरे नही दिखते यहाँ आपको ट्रेजडी कॉमेडी दोनों के हालातों से गुजरना पडता है एक बच्चे को जहाँ संस्कृत और हिंदी के छन्द और गणित के सारे प्रमेय याद होते है वही दूसरे को ढंग से हिंदी के अक्षर पढ़ना नही आता (8वी तक के बच्चो को पास करने का आदेश जो है) खेर क्लास में योग्यता के हिसाब से अगर ग्रुप बनाये जाए तो 6 -7 ग्रुप बनेगे ।
बच्चो पर हाथ नहीँ उठाता ( बच्चो पे हाथ उठाना अच्छा नई लगता) । मैं इन्हें श्लोक सिखाना चाहता हूँ सिखाना चाहता हूँ साहित्य का सौंदर्य की इतिहास के किरदार कितने मज़ेदार है पर ये कमरे में लगे नए स्विच बोर्ड में को निहारने में व्यस्त है मैं उन्हें श्लोक बुलबाता हूँ वो अपनी पेंसिल और स्केल को अपने फटे बैग पर पटक पटक कर उस लय को संगीत देने में लगे है ।
मैं इन्हें मजबूत दृढ़ और वलिष्ट बच्चो की कहानियां सुनाना चाहता हूँ पर इनके बाल उलझे है हाथ पैर रूखे और फट रहे है पिछले साल की यूनिफॉर्म की सिलाई उखड़ रही है शर्ट के 2 3 बटन गायब है ।
हाथ की हथेलियां थोड़ी सख्त हो गई है पैरो की एड़िया भी फट रही है सोयाबीन काटने की बजह से उनमे छोटे छोटे घाव हो गए है। मैं उनके साथ सख्त होना चाहता हूँ पर असफल रहता हूँ उनके साथ वैसे भी जिंदगी तो इतनी सख्त है । बीच मे स्कूल आने के लिए कीचड़ भरी नदी है जिनमे वो नंगे पैरो से आते है उसको अपनी साइकिल से पार करके आना भी मुझे भीतर तक दुखी कर देता है। किसी के पापा नही है और कोई मातृरविहीन है पिता खाली हाथ है पैसे से भी ओर काम से भी। इनकी नियति क्रूर है
लेकिन इनकी आंखों में चमक है बस शरीर का एकमात्र हिस्सा जो उनके जिंदा रहने का अहसास कराता है ।
इनके आईएएस डॉक्टर इंजीनयर नेता बनने के ख्वाब इनमें दिखाई देते है।
बाकी हर रोज प्रार्थना करता हूँ कि कभी ऐसी मुसीबत में न फसो की तुम्हारी यह निश्छलता खो न जाये, बस इतना ही कि तुम इतने ताकतवर बनो की हर मुश्किल और तकलीफ तुम्हारे आगे घुटने टेक दे।
पीयूष शास्त्री
गौरझामर
शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017
सरकारी स्कूल और मैं
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